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द्रोण पर्व
अध्याय ४५
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सञ्जय़ उवाच
स तस्य भुजनिर्मुक्तो लक्ष्मणस्य सुदर्शनम् |  १७   क
सुनसं सुभ्रु केशान्तं शिरोऽहार्षीत्सकुण्डलम् |  १७   ख
लक्ष्मणं निहतं दृष्ट्वा हा हेत्युच्चुक्रुशुर्जनाः ||  १७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति