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अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
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अग्निरु उवाच
एवमेतत्पुरा वृत्तं तस्य यज्ञे महात्मनः |  ५३   क
देवश्रेष्ठस्य लोकादौ वारुणीं विभ्रतस्तनुम् ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति