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अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
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अग्निरु उवाच
अग्न्यभावे च कुर्वन्ति वह्निस्थानेषु काञ्चनम् |  ५५   क
जामदग्न्य प्रमाणज्ञा वेदश्रुतिनिदर्शनात् ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति