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अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
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अग्निरु उवाच
तस्य चातमसो लोका गच्छतः परमां गतिम् |  ५९   क
स्वर्लोके राजराज्येन सोऽभिषिच्येत भार्गव ||  ५९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति