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अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
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अग्निरु उवाच
सेन्द्रेषु चैव लोकेषु प्रतिष्ठां प्राप्नुते शुभाम् |  ६३   क
इह लोके यशः प्राप्य शान्तपाप्मा प्रमोदते ||  ६३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति