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अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
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अग्निरु उवाच
ततः सम्पद्यतेऽन्येषु लोकेष्वप्रतिमः सदा |  ६४   क
अनावृतगतिश्चैव कामचारी भवत्युत ||  ६४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति