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अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
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अग्निरु उवाच
न च क्षरति तेभ्यः स शश्वच्चैवाप्नुते महत् |  ६५   क
सुवर्णमक्षय़ं दत्त्वा लोकानाप्नोति पुष्कलान् ||  ६५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति