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अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
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अग्निरु उवाच
अग्निरित्येव तत्प्राहुः प्रदानं वै सुखावहम् |  ६७   क
यथेष्टगुणसम्पन्नं प्रवर्तकमिति स्मृतम् ||  ६७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति