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वन पर्व
अध्याय २३८
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दुर्योधन उवाच
दुर्विनीताः श्रिय़ं प्राप्य विद्यामैश्वर्यमेव च |  १७   क
तिष्ठन्ति न चिरं भद्रे यथाहं मदगर्वितः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति