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वन पर्व
अध्याय २६३
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मार्कण्डेय़ उवाच
वने महति तस्मिंस्तु रामः सौमित्रिणा सह |  २४   क
ददर्श मृगय़ूथानि द्रवमाणानि सर्वशः |  २४   ख
शव्दं च घोरं सत्त्वानां दावाग्नेरिव वर्धतः ||  २४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति