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शान्ति पर्व
अध्याय २५८
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भीष्म उवाच
व्यभिचारे तु कस्मिंश्चिद्व्यतिक्रम्यापरान्सुतान् |  ७   क
पित्रोक्तः कुपितेनाथ जहीमां जननीमिति ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति