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वन पर्व
अध्याय ८५
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वैशम्पाय़न उवाच
विश्वामित्रस्य तां दृष्ट्वा विभूतिमतिमानुषीम् |  १२   क
कन्यकुव्जेऽपिवत्सोममिन्द्रेण सह कौशिकः |  १२   ख
ततः क्षत्रादपाक्रामद्व्राह्मणोऽस्मीति चाव्रवीत् ||  १२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति