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द्रोण पर्व
अध्याय ५६
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सञ्जय़ उवाच
एकाह्नाहममर्षं च सर्वदुःखानि चैव ह |  ३७   क
भ्रातुः पितृष्वसेय़स्य व्यपनेष्यामि दारुक ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति