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वन पर्व
अध्याय ८५
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वैशम्पाय़न उवाच
यत्रासौ व्रह्मशालेति पुण्या ख्याता विशां पते |  १८   क
धूतपाप्मभिराकीर्णा पुण्यं तस्याश्च दर्शनम् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति