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वन पर्व
अध्याय ८५
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वैशम्पाय़न उवाच
पवित्रो मङ्गलीय़श्च ख्यातो लोके सनातनः |  १९   क
केदारश्च मतङ्गस्य महानाश्रम उत्तमः ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति