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वन पर्व
अध्याय ८५
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वैशम्पाय़न उवाच
कुण्डोदः पर्वतो रम्यो वहुमूलफलोदकः |  २०   क
नैषधस्तृषितो यत्र जलं शर्म च लव्धवान् ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति