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वन पर्व
अध्याय ८५
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वैशम्पाय़न उवाच
यत्र देववनं रम्यं तापसैरुपशोभितम् |  २१   क
वाहुदा च नदी यत्र नन्दा च गिरिमूर्धनि ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति