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वन पर्व
अध्याय ८५
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वैशम्पाय़न उवाच
महानदी च तत्रैव तथा गय़शिरोऽनघ |  ८   क
यत्रासौ कीर्त्यते विप्रैरक्षय़्यकरणो वटः |  ८   ख
यत्र दत्तं पितृभ्योऽन्नमक्षय़्यं भवति प्रभो ||  ८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति