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उद्योग पर्व
अध्याय ८५
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विदुर उवाच
राजन्वहुमतश्चासि त्रैलोक्यस्यापि सत्तमः |  १   क
सम्भावितश्च लोकस्य संमतश्चासि भारत ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति