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भीष्म पर्व
अध्याय ८५
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सञ्जय़ उवाच
द्रोणेन निहतास्तत्र क्षत्रिय़ा वहवो रणे |  २२   क
विवेष्टन्तः स्म दृश्यन्ते व्याधिक्लिष्टा नरा इव ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति