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द्रोण पर्व
अध्याय ९०
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सञ्जय़ उवाच
ते वध्यमानाः समरे हार्दिक्येन स्म पाण्डवाः |  ४८   क
इतश्चेतश्च धावन्तो नैव चक्रुर्धृतिं रणे ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति