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भीष्म पर्व
अध्याय ८५
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सञ्जय़ उवाच
उष्णीषैरपविद्धैश्च पताकाभिश्च सर्वषः |  ३४   क
अनुकर्षैः शुभै राजन्योक्त्रैश्चव्यसुरश्मिभिः |  ३४   ख
सञ्छन्ना वसुधा भाति वसन्ते कुसुमैरिव ||  ३४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति