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द्रोण पर्व
अध्याय ८५
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धृतराष्ट्र उवाच
भारद्वाजं कथं युद्धे युय़ुधानोऽभ्यवारय़त् |  १   क
सञ्जय़ाचक्ष्व तत्त्वेन परं कौतूहलं हि मे ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति