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द्रोण पर्व
अध्याय १२९
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सञ्जय़ उवाच
नैव स्वे न परे राजन्प्राज्ञाय़न्त तमोवृते |  २२   क
उन्मत्तमिव तत्सर्वं वभूव रजनीमुखे ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति