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द्रोण पर्व
अध्याय ८५
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सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्द्रोणेन निहताः पाञ्चालाः पञ्चविंशतिः |  २८   क
महारथसमाख्याता धृष्टद्युम्नस्य संमताः ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति