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द्रोण पर्व
अध्याय ८५
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सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालान्सृञ्जय़ान्मत्स्यान्केकय़ान्पाण्डवानपि |  ३१   क
द्रोणोऽजय़न्महावाहुः शतशोऽथ सहस्रशः ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति