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द्रोण पर्व
अध्याय ८५
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सञ्जय़ उवाच
गाण्डीवस्य च निर्घोषे विप्रनष्टे समन्ततः |  ३७   क
कश्मलाभिहतो राजा चिन्तय़ामास पाण्डवः ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति