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द्रोण पर्व
अध्याय ८५
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सञ्जय़ उवाच
यो हि शैनेय़ मित्रार्थे युध्यमानस्त्यजेत्तनुम् |  ४८   क
पृथिवीं वा द्विजातिभ्यो यो दद्यात्सममेव तत् ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति