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द्रोण पर्व
अध्याय ८५
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सञ्जय़ उवाच
शिष्यो मम सखा चैव प्रिय़ोऽस्याहं प्रिय़श्च मे |  ५७   क
युय़ुधानः सहाय़ो मे प्रमथिष्यति कौरवान् ||  ५७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति