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द्रोण पर्व
अध्याय ८५
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सञ्जय़ उवाच
अस्मदर्थं च राजेन्द्र संनह्येद्यदि केशवः |  ५८   क
रामो वाप्यनिरुद्धो वा प्रद्युम्नो वा महारथः ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति