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द्रोण पर्व
अध्याय ८५
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सञ्जय़ उवाच
ते वर्म भित्त्वा सुदृढं द्विषत्पिशितभोजनाः |  ६   क
अभ्यगुर्धरणीं राजञ्श्वसन्त इव पन्नगाः ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति