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द्रोण पर्व
अध्याय ८५
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सञ्जय़ उवाच
इति द्वैतवने तात मामुवाच धनञ्जय़ः |  ६१   क
परोक्षं त्वद्गुणांस्तथ्यान्कथय़न्नार्यसंसदि ||  ६१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति