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द्रोण पर्व
अध्याय ८५
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सञ्जय़ उवाच
तस्य त्वमेवं सङ्कल्पं न वृथा कर्तुमर्हसि |  ६२   क
धनञ्जय़स्य वार्ष्णेय़ मम भीमस्य चोभय़ोः ||  ६२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति