सभा पर्व  अध्याय २८

वैशम्पाय़न उवाच

धर्मराजाय़ तत्सर्वं निवेद्य भरतर्षभ |  ५५   क
कृतकर्मा सुखं राजन्नुवास जनमेजय़ ||  ५५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति