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शान्ति पर्व
अध्याय ९५
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वामदेव उवाच
न चाप्यलव्धं लिप्सेत मूले नातिदृढे सति |  २   क
न हि दुर्वलमूलस्य राज्ञो लाभो विधीय़ते ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति