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द्रोण पर्व
अध्याय ८५
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सञ्जय़ उवाच
अपर्यन्ते वले मग्नो जह्यादपि च जीवितम् |  ७९   क
तस्मिंश्च निहते युद्धे कथं जीवेत मादृशः |  ७९   ख
सर्वथाहमनुप्राप्तः सुकृच्छ्रं वत जीवितम् ||  ७९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति