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द्रोण पर्व
अध्याय ८५
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सञ्जय़ उवाच
नाहं शोचामि दाशार्हं गोप्तारं जगतः प्रभुम् |  ८६   क
स हि शक्तो रणे तात त्रीँल्लोकानपि सङ्गतान् ||  ८६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति