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द्रोण पर्व
अध्याय ८५
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सञ्जय़ उवाच
विजेतुं पुरुषव्याघ्र सत्यमेतद्व्रवीमि ते |  ८७   क
किं पुनर्धार्तराष्ट्रस्य वलमेतत्सुदुर्वलम् ||  ८७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति