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द्रोण पर्व
अध्याय ८५
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सञ्जय़ उवाच
अर्जुनस्त्वेव वार्ष्णेय़ पीडितो वहुभिर्युधि |  ८८   क
प्रजह्यात्समरे प्राणांस्तस्माद्विन्दामि कश्मलम् ||  ८८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति