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द्रोण पर्व
अध्याय ८५
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सञ्जय़ उवाच
भीष्मद्रोणावतिक्रम्य सर्वय़ुद्धविशारदम् |  ९२   क
त्वामद्य पुरुषव्याघ्रं लोके सन्तः प्रचक्षते ||  ९२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति