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द्रोण पर्व
अध्याय ८५
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सञ्जय़ उवाच
सम्भावना हि लोकस्य तव पार्थस्य चोभय़ोः |  ९४   क
नान्यथा तां महावाहो सम्प्रकर्तुमिहार्हसि ||  ९४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति