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द्रोण पर्व
अध्याय ८५
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सञ्जय़ उवाच
वासुदेवमतं चैतन्मम चैवार्जुनस्य च |  ९९   क
सत्यमेतन्मय़ोक्तं ते याहि यत्र धनञ्जय़ः ||  ९९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति