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वन पर्व
अध्याय ५३
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नल उवाच
तेषामहं संनिधौ त्वां वरय़िष्ये नरोत्तम |  २०   क
एवं तव महावाहो दोषो न भवितेति ह ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति