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शल्य पर्व
अध्याय २२
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सञ्जय़ उवाच
भूमौ निपतिताश्चान्ये वहवो विजय़ैषिणः |  ५१   क
तत्र तत्र व्यदृश्यन्त पुरुषाः शूरमानिनः ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति