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वन पर्व
अध्याय १५३
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वैशम्पाय़न उवाच
स तु नूनं महावाहुः प्रिय़ार्थं मम पाण्डवः |  १५   क
प्रागुदीचीं दिशं राजंस्तान्याहर्तुमितो गतः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति