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द्रोण पर्व
अध्याय १५४
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सञ्जय़ उवाच
अविन्दमानास्त्वथ शर्म सङ्ख्ये; यौधिष्ठिरं ते वलमन्वपद्यन् |  १२   क
तान्प्रेक्ष्य भग्नान्विमुखीकृतांश्च; घटोत्कचो रोषमतीव चक्रे ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति