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आदि पर्व
अध्याय ८५
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यय़ातिरु उवाच
स जाय़मानो विगृहीतगात्रः; षड्ज्ञाननिष्ठाय़तनो मनुष्यः |  १५   क
स श्रोत्राभ्यां वेदय़तीह शव्दं; सर्वं रूपं पश्यति चक्षुषा च ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति