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द्रोण पर्व
अध्याय ११५
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सञ्जय़ उवाच
ते सर्वतः सम्परिवार्य सङ्ख्ये; शैनेय़माजघ्नुरनीकसाहाः |  २३   क
स चापि तान्प्रवरः सात्वतानां; न्यवारय़द्वाणजालेन वीरः ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति