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भीष्म पर्व
अध्याय ८६
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सञ्जय़ उवाच
इरावानथ निर्भिन्नः प्रासैस्तीक्ष्णैर्महात्मभिः |  ३२   क
स्रवता रुधिरेणाक्तस्तोत्त्रैर्विद्ध इव द्विपः ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति