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भीष्म पर्व
अध्याय ८६
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सञ्जय़ उवाच
स नागैर्वहुशो राजन्सर्वतः संवृतो रणे |  ६७   क
दधार सुमहद्रूपमनन्त इव भोगवान् |  ६७   ख
ततो वहुविधैर्नागैश्छादय़ामास राक्षसम् ||  ६७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति